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आप कैसे जान सकोगे के आपने सही साथी चुना है या नहीं ? देखिये सबसे जरूरी बात यही है की आप किसी पर भी बहुत जल्दी यकीन करके उससे रिश्ता बनाने की जल्दी नहीं करनी। अगर आप किसी इंसान को चाहती है और उससे शादी करना चाहती है तो रुकिये जल्दबाज़ी न करे क्योकि जल्दबाज़ी से बनी चीज़े जल्दी टूट भी जाती है। अगर आप किसी को पसंद करती है तो और शादी भी करना चाहती है तो सबसे पहले उस इंन्सान को अच्छे से समझिये जिस के साथ आपको सारी उम्र बितानी है। वक़्त लीजिये कम से कम 1 या 2 साल का। क्योकि उस इंसान के साथ आपको सारी उम्र रहना है। उनसे बातचीत करते रहे तो आपको काफी कुछ पता लगना शुरू हो जायेगा, अच्छी के साथ बुरी आदते भी सामने आती जाएगी। कुछ वक़्त के बाद इंसान असली रूप में आ जाते है जैसा की आपने बिग बॉस में देखा होगा वो पहले बहुत अच्छे होते है फिर धीरे धीरे वो अपने असली स्वभाव में आ जाते है। इतना वक़्त लेने के पीछे मक़सद सिर्फ यही समझना है के क्या वो भी आपको उतना प्यार करता है जितना आप करती है, क्या वो भी उतना ही गंभीर इस रिश्ते को लेकर जितने आप हो ? सिर्फ 2 या 3 मह...
गरीबी खुद को गरीब मानने में है। - राल्फ वाल्डो एमरसन यदि आप अमीर और कामयाब और स्वस्थ बनने का फैसला नहीं लेते है तो समझिये की अनजाने में गरीब , नाकामयाब बने रहने का फैसला कर लिया है। दुनिया में जो कुछ भी हम देख रहे है, वो आपस में जुड़ा हुआ है। वस्तुऐं नहीं विचार वेल्थ का जरिया है। आपके विचार ही आपको विकसित करते है समृद्ध बनाते है। अगर इस दुनिया के होने का कोई मक़सद है तो इसमें हमारे होने का भी एक मक़सद है, इसे खोज निकालो। - आइस्टीन नेपोलियन हिल ने भी अपनी किताब think and grow rich में सम्पति के आने का जरिया इंसान के दिमाग को ही बताया था। थॉमस एडिसन ने भी कहा था की विचार स्पेस से आते है। सुनने में ये बात असंभव लगती है इस बात पर यकीन नहीं आता। लेकिन ये सच है जब विचार आपके दिमाग में आता है तो आप उसे जाहिर करने के लिए जरिये ढूंढते है। हर चीज आपके जीवन में आने से पहले आपके दिमाग में आती है। दिमाग से गुजरे बिना वो आपके जीवन में आ ही नहीं सकती। हम जो भी तस्वीरें अपने दिमाग के सिनेमा में देख...
ज्यादा बोलकर अपनी जुबान से अपना गला न काटे। ज्यादा बोलने वाला दुखी रहता है और कम बोलने वाला सुखी । ज्यादा बोलने से कही बेहतर है ज्यादा सुनना। क्यों ? आइये जानते है। बातचीत में दो चीजे शामिल होती है बताना और सुनना। बोलना जरुरी है लेकिन उससे भी जरुरी है सुना जाना। अगर आप बातचीत के दौरान सिर्फ अपनी ही सुनते रहते है और दुसरो को बोलने का मौका नहीं देते तो लोग या तो आपकी बात पर ध्यान नहीं देंगे या धीरे- धीरे आपसे पीछे हट जायेगे, क्योकि आप उनको बोलने का मौका ही नहीं दे रहे। सुनना ही परवाह करना है। सबसे पहले सुनिए। ये दर्शता है की आप परवाह करते है और दूसरा आपके लिए जरुरी है। सुनने और ध्यान से सुनने में बहुत फर्क होता है दुसरो को ध्यान से सुनने का मतलब है की आप उस बातचीत में सक्रिय और और दुसरो की बात और भावनाओ को समझ रहे है और उन्हें अच्छे से सुनने के बाद आप अपनी बात रखते है इस तरह बातचीत में सही संतुलन बना रहता है और आपका दुसरो के साथ अच्छा रिश्ता बन जाता है। ज्यादातर लोगो की यही शिकायत होती है के उन्हें ...
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